यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।
अर्थ हे अर्जुन! जो भी भाव को भी स्मरण करते हुए अंतिम काल में शरीर को त्यागता है, वही वास्तव में ही, उसी भाव से ही भवित हो उसी गति को प्राप्त होता है अर्थात भावानुसार गर्भ में चला जाता है व्याख्यागीता अध्याय 8 का श्लोक 6
मृत्यु के समय जब जीव शरीर का त्याग करता है उस समय में जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ देह त्यागता है उसी को प्राप्त होता है, यानि अगला जन्म वही मिलेगा जो अन्त समय में स्मरण करता हुआ मृत्यु हुई है। क्योंकि वह हमेशा उन्हीं भावों (विचारों) से भावित रहता है।
उदाहरण - जैसे कई व्यक्ति अपने जीवन में कुत्तों को रखने के शौकीन होते हैं। व्यक्ति पूरे जीवन कुत्तों में रहा, जब मृत्यु आती है तब वही विचार चलते हैं, जिन विचारों में जीवन गुजारा यानि कुत्तों की ही याद आएगी, उनको ही चिन्तन करता हुआ मरेगा वह जीव उसी गर्भ को प्राप्त करेगा। यानि कुत्ते की जूणी में जन्म होगा, जो भी जीव जिस-जिस भाव का स्मरण करता देह त्याग करता है, उसी को प्राप्त होता है, चाहे वह भाव धन, परिवार, दुख, क्रोध, कैसे भी हो वैसा ही जीवन उसको आगे प्राप्त होगा, जैसे धन का चिन्तन करता हुआ देह त्याग करता है तो, अगले जन्म वह धन के पीछे भागेगा, हाँ यह बात अलग है कि उसे धन मिले या ना मिले लेकिन उसका स्वभाव लोभी रहेगा। ऐसे ही कोई स्वर्ग की कामना करता हुआ मरेगा उसके कर्मों के हिसाब से स्वर्ग मिलेगा और भगवान कहते हैं मेरा स्मरण (निर्गुण निराकार परम प्रभु जो सर्वत्र व्याप्त है) करता हुआ शरीर त्याग कर जाता है वह मुझको ही प्राप्त होता है।
परम प्रभु की लीला तो देखों, सब कुछ मनुष्य की सोच पर ही छोड़ दिया, लोग कहते है कि भगवान ने सुख नहीं लिखा, भगवान ने तो जीव की इच्छा पर सब छोड़ रखा है। मनुष्य चाहे तो कुत्ता बने, चाहे देवता, और चाहे तो मोक्ष, सब कुछ परम ने जीव की सोच पर छोड़ दिया है, इस से ज्यादा तो और क्या दयालु होंगे भगवान।
आपकी आज की सोच ही आपके भविष्य का निर्माण करती है, और आपके भविष्य की सोच ही अगले जन्म का निर्माण करती है।