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अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।।
अर्थ हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! विघटित एंव परिवर्तित होने वाला भाव अधिभूत है।ब्रह्म सवरूप अधिदैव है और सभी प्राणियों की देह में अन्तर्यामी रूप से मैं ही अधियज्ञ हूँ व्याख्यागीता अध्याय 8 का श्लोक 4 - Geeta 8.4 अधिभूत अर्थात इस जगत में जितनी भी उत्पत्ति होती है और फिर उनका विनाश यानि खत्म हो जाते हैं जैसे पेड़, पौधे, जीव-जन्तु, पशु, पक्षी मनुष्य का शरीर यह सब के सब अधिभूत हैं।  
• अधिदेव का अर्थ है सभी शरीरों में जो मन है यह अधिदेव है, यह शरीर के मारे जाने पर भी मारा नहीं जाता जैसे ही अधिभूत यानि शरीर का विनाश होता है वैसे ही यह अधिदेव यानि मन दूसरे शरीर की प्राप्ति की यात्रा करता है।  
• अधियज्ञ का अर्थ है हमारी आत्मा सबके शरीर में नाशवान है, और इस ब्रह्म में विचारों की एक ग्रन्थी हमारा मन होता है, यह मन, शरीर और आत्मा के बीच का केन्द्र है, इस मन की आसक्तियों के कारण मनुष्य को बार-बार शरीर धारण करना पड़ता है, शरीर और मन के पार जब आप पहंचते हो तब आपको अपने स्वरूप का पता चलता है वह आपकी आत्मा ही अधियज्ञ है, सबके शरीर में आत्म रूप से एक परम प्रभु ही अधियज्ञ है।  
तीसरे व चौथे दो श्लोकों में ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदेव, अधियज्ञ का वर्णन हुआ है। इसे समझने के लिए जल का एक उदाहरण लेते हैं। जैसे जब आकाश स्वच्छ होता है तब हमारे और सूर्य के बीच जो आकाश (स्पेश) है उसमें कुछ भी नहीं दिखता न दिखने पर भी वास्तव में वहां परमाणु रूप में जल तत्व होता है, वही जल तत्व भाप बनता है और भाप ज्यादा बढ़ने पर बादल बनता है, बादल में जल कण रहते हैं उन कण के मिलने से बूँदें बन जाती है, उन बूँदों में जब ठण्डक के संयोग से ठण्ड ज्यादा बढ़ती है तब वे ही बूँदें ओले (बर्फ) बन जाती है - यह जल तत्व का रूप है।  
ऐसे एक परम प्रभु अर्थात निर्गुण निराकार ही ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदेव, अधियज्ञ रूप में सर्वत्र व्याप्त है।  
जैसे सोने के बने कड़े, हार, चेन, बाजूबन्द, कंगन देखने में अलग-अलग दिखते हैं लेकिन इन सब में सोना ही है, ऐसे ही देखने में चन्द्रमा, सूर्य, पृथ्वी अनेक ग्रह अलग अलग दिखते हैं लेकिन यह सम्पूर्ण ब्रह्म परम में ही रचा है।