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जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। 
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।
अर्थ हे अर्जुन! मेरे कर्म और जन्म दिव्यता को प्राप्त हैं । जो मनुष्य मेरे इन जन्म और कर्म को तत्व से जान लेता है, वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझमे ही विलीन होकर परमधाम को प्राप्त होता है व्याख्याहे अर्जुन**!** मेरे जन्म व कर्म दिव्य है। परम प्रभु जन्म मृत्यु से सर्वथा अतीत- अजन्मा और अविनाशी है। उनका मनुष्यों में अवतार साधारण मनुष्यों की तरह नहीं होता। वे जीवों का हित करने के लिए स्वतंत्रता पूर्वक मनुष्य के रूप में जन्म धारण की लीला करते हैं। परम प्रभु के जन्म व कर्म दिव्य है। जब प्रभु जन्म लेकर इस पृथ्वी पर कर्म करते हैं, उनको आम व्यक्ति सोच भी नहीं सकता। प्रभु जब वह कर्म मनुष्य रूप में कर देते हैं, तो प्रजा के लिए वह कर्म चमत्कार से कम नहीं होता। वह कर्म दिव्य (देवताओं जैसा) होता है। निष्काम भाव से केवल दूसरों के हित के लिए कर्म करने पर वह कर्म दिव्य हो जाता है। परमात्मा ही जगत रूप से प्रकट हुए हैं। इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, कण-कण में परमात्मा के दर्शन जो योगी करने लग जाता है, वह जीव शरीर को त्यागकर (मरने के बाद) फिर आगे जन्म नहीं लेता। भगवान कह रहे हैं किन्तु मुझे यानि परम धाम को ही प्राप्त होता है। जिसे हीरे मिल जाएं, वह कंकर-पत्थर मुट्ठी से छोड़ देता है, और जिसको महल मिल जाए, वह झोपड़ी को भूल जाता है। जिस व्यक्ति को दिव्य के दर्शन हो जाए उसके लिए संसार के सब पदार्थ कंकर-पत्थर जैसे हो जाते हैं, फिर उसको संसार में जन्म लेने की जरूरत ही नहीं पड़ती, फिर वह इस लोक को छोड़ कर अलोक में प्रवेश कर जाता है।