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तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।
अर्थ इसलिए, निरासक्त होकर सदा कर्तव्य कर्म करो। क्योंकि आसक्ति रहित व्यक्ति कर्म करता है, वह परमात्मा को प्राप्त होता है व्याख्याभगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! तू फल की इच्छा का त्याग करने के लिए कर्म कर,तू निरन्तर आसक्ति रहित होकर कर्त्तव्य कर्म का भली भांति आचरण कर। इच्छा के सहित होने से मनुष्य संसार के जन्म मरण से बन्ध जाते हैं और इच्छा से रहित होकर कर्म करता हुआ योगी परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। संसार में इच्छा ही बन्धन है और इच्छा त्याग ही मुक्ति है।