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यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।।
अर्थ जो मनुष्य केवल अपने आत्मा में ही रमण करता है और आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता व्याख्याजो मनुष्य आत्मा में  ही रमण करने वाला,आत्मा में ही तृप्ति, आत्मा में ही सन्तुष्ट उस मनुष्य के लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है। कारण कि जो आत्मा में रमण नहीं करता वह संसार में रमण करता है। संसार में तृप्ति,सन्तुष्टि करना चाहता है परन्तु इस संसार में स्त्री,पुत्र,परिवार से प्रीति, भोगों से तृप्ति, धन से सन्तुष्टि मानता है उस मनुष्य को संसार में ना प्रीति,तृप्ति,सन्तुष्टि मिलती है ना मुक्ति, कारण कि संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील व नाशवान है जिन योगियों को आत्म ज्ञान हो गया है वह संसार में नहीं आत्मा में ही प्रीति,तृप्ति व सन्तुष्ट रहते है।