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देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।
अर्थ इस मानव शरीर में जैसे कि बचपन, यौवन और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति भी होती है। धीर व्यक्ति उसमें मोहित नहीं होता। व्याख्याइस मनुष्य शरीर में जैसे बालकपन, जवानी, वृद्धावस्था की प्राप्ति होती है आप अच्छे से समझें इस बात को आत्मा वही है इस शरीर में लेकिन शरीर वह नहीं है। शरीर पल-पल बदल रहा है। मनुष्य का जब जन्म होता है तब बालकपन में शरीर छोटा सा होता है यही कोई तीन किलो के वजन का शरीर, फिर पल-पल बदलते हुए जवानी में अपना अलग रूप धारण कर लेता है। आप अपने सामने बचपन की फोटो रखो और दूसरी फोटो अब की रखो दोनों को मिलाओ और शांत होकर चिंतन करो कि यह वही शरीर है जो बदलकर नया रूप धारण कर चुका है और अब भी अदृश्य रूप में पल-पल बदल रहा है। इस शरीर का आप अब जो रूप देख रहे हो वह भी नहीं रहेगा वह भी बदलकर बुढ़ापे में जर-जर हो जायेगा। फिर जीव इस शरीर को छोड़ कर नई देह व नया रूप धारण कर लेता है। आगे भगवान कहते हैं कि जीव ही प्रकृति माया से मोहित होकर आगे से आगे अपनी इच्छाओं की प्राप्ति के लिए नये शरीर का धारण करते रहते हैं। इसमें आत्मा किसी भी विषय से मोहित नहीं होती। जीव ही विषयों में मोहित होकर बंधते हैं। अगर जीव विषयों में मोहित नहीं हो तो शरीर छुटने के बाद आगे जन्म भी नहीं होता। जन्म विषयों के भोग की कामना से होता है अगर विषय नहीं तो जीव आत्मा ही है आत्मा ही परम है बिना आसक्तियों का व्यक्ति जीते जी मोक्ष को प्राप्त है। जब ज्ञानी को परम का सच्चा ज्ञान हो जाता है तब वह धीर पुरुष बन जाता है यानि सम हो जाता है।