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सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।
अर्थ  हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है। इसलिए जो जैसी श्रद्धावाला है वही उसका स्वरूप है अर्थात् वही उसकी निष्ठा स्थिति है। व्याख्यासभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुरूप होती है यह पुरुष (जीव) श्रद्धामय है इसलिए जो मनुष्य जैसी श्रद्धा वाला है वही उसका स्वरूप है जैसा भीतर भाव होगा वैसा ही उसका स्वरूप होगा।
  • मनुष्य के भीतर जीव बैठा है यह श्रद्धामय है अर्थात् आप अलग-अलग मनुष्य की भक्ति, कर्म, बातें उनका स्वभाव देखकर अंदाजा लगा सकते हैं कि यह व्यक्ति किस स्वभाव यानि प्रकृति के कौन से गुण (सत्व, रज, तम) का है। जो व्यक्ति जिस गुण का है, उसका स्वभाव और भाव वैसा ही है। जिसके जैसे भाव हैं, वही उन लोगों का स्वरूप है।
इन तीन गुणों वाले व्यक्तियों के जो पूजन हैं वह किन-किन की पूजा करते हैं, और इनकी श्रद्धा की पहचान किस प्रकार होती है। इस ज्ञान को आगे के श्लोक में बताते हैं।