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श्री भगवानुवाच

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु।।
अर्थ श्री भगवान बोले: मनुष्यों की वह स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्विक तथा राजसी और तामसी ऐेसे तीन तरह की ही होती हैं। उसको तुम मुझसे सुनो। व्याख्यामनुष्य की अपने स्वभाव से श्रद्धा उत्पन्न होती है जैसा स्वभाव जिस मनुष्य का होगा उसकी श्रद्धा वैसी ही होगी, जैसे सत्वगुण स्वभाव के मनुष्य दैवी प्रवृत्ति के और रज-तम स्वभाव के मनुष्य आसुरी प्रवृत्ति के होते हैं। जैसे स्वभाव का मनुष्य होगा सत्व, रज, तम वैसे ही तीन तरह की श्रद्धा सबकी होती है। भगवान कहते हैं उन तीन तरह की श्रद्धा को तुम मुझसे सुनो।