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सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।
अर्थ जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा दिखाने के भाव से भी किया जाता है वह इस लोक में अनिश्चित और नाशवान फल देने वाला तप राजस कहा जाता है। जो तप मूढ़ता पूर्वक हठ से अपने को पीड़ा देकर अथवा दूसरों को कष्ट देने के लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है। व्याख्याजो तप सत्कार, मान-सम्मान, पूजा-पाठ दिखाने के भाव से किया जाता है जैसे हम जहाँ कहीं जाएंगे, वहाँ हमें लोग तपस्वी समझकर आवागमन के लिए हमारे सामने आएं, पूरे शहर में हमारी सवारी निकालंे, हमें बैठने के लिए ऊँचा आसन दें। जीते जी हमारे चरणों को लोग अपने माथे पर लगाएँ, और हमारी पूजा करे, इस भाव से जो तप किया जाता है वह नाशवान फल देने वाला राजस तप कहा जाता है।
तामस विचारों वाले मनुष्य पशु बुद्धि से भी नीचे है क्योंकि पशु खुद दुख पाकर दूसरे को तो दुख नहीं देते। तामस मनुष्य तो खुद के शरीर को पीड़ा देकर दूसरों को भी दुख देते हैं। दूसरों को कष्ट देने के लिए किया जाता है वह तप तामस कहलाता है।