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देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।
अर्थ देवता, ब्राहमण, गुरूजन, और जीवन मुक्त महापुरूष का यथा योग्य पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन करना और हिंसा न करना, यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता हैं जो किसी को भी अद्विग्न न करने वाला, सत्य और प्रिय तथा हितकारक शब्द है, वह तथा स्वाध्याय और अभ्यास समयोग, नामजप आदि भी वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है। मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह और भावों की भलीभाँति शुद्धि इस तरह यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है। व्याख्यादेवता, गुरु, ज्ञानीजन अर्थात जिससे हमें शिक्षा प्राप्त होती है, ऐसे हमारे माता-पिता, बड़े-बूढे, कुल के आचार्य, पढ़ाने वाले अध्यापक, जो आपसे उम्र में बड़े हैं, उन सबके लिए अपने भीतर श्रद्धा भाव रखना ही पूजन करना है।
पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचार्य और अहिंसा यह शरीर के संबंधी तप है कुछ लोग आग जलाकर तप करने को तप समझते हैं, वह तप नहीं दम्भ होता है।
अपने कर्तव्य कर्म को निभाने के लिए, अपने स्वधर्म के मार्ग पर चलना और कष्ट आए तो उनको सहन करना ही शरीर का तप होता है।
आगे भगवान कहते हैं कि जो आप शब्द बोलते हैं, वह आपके शब्द दूसरों को पीड़ा ना पहुंचाने वाले होने चाहिए। वह शब्द सत्य और प्रिय तथा हितकारक होने चाहिए अर्थात आप जो वाक्य बोलते हैं उसमें आपका अहंकार छोड़कर जैसी बात है उसको उसी भाव में सत्य और मीठी वाणी से कह देना ही वाणी संबंधित तप होता है।
शरीर और वाणी तप के बाद आगे भगवान मन का तप बताते हैं मन में कोमलता, मन को प्रसन्न और सौभ्य (शांत) रखना, मन की विकृतियों को वश में करना, भावों को शुद्ध रखना, शांति, धर्म और संतोषी रहना, मन संबंधित तप होता है।