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न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।
अर्थ उस परमपद को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसार में नहीं आते, वही मेरा परम धाम हैं। व्याख्यापिछले श्लोक में भगवान ने बताया कि परम विचारों वाले योगी उस परमपद को प्राप्त होते हैं।
उस परमपद को न सूर्य, न चंद्र, न अग्नि प्रकाशित कर सकती है अर्थात् सूर्य, चंद्रमा, अग्नि परमात्मा का ही तेज है। परमात्मा से प्रकाश पाकर यह प्रकाशित होते हैं, फिर यह परम को कैसे प्रकाशित कर सकते हैं, इनका प्रकाश है वह प्रकाश भी परमात्मा का है। उस परम को प्राप्त होकर जीव दोबारा संसार में लौटकर नहीं आते वही मेरा परमधाम है।
संपूर्ण संसार प्रदेश है या पराया घर है, अपना घर नहीं, अलग-अलग योनियों और लोकों में भटकना तभी बंद होगा, जब आप अपने असली घर में पहुँच जाओगे संपूर्ण प्राणियों का अपना असली घर परमधाम है। भगवान का जो धाम है वही हमारा धाम है, परमधाम की प्राप्ति होने पर जीव को फिर लौटकर संसार माया में नहीं आना पड़ता। जब तक हम उस अपने धाम में नहीं जाएंगे तब तक हम इस आवागमन की अनेक योनियों में घूमते रहेंगे, इसलिए मनुष्य को संसार के विषय विष समझ कर अपने मन से त्याग देने चाहिए और अपने परमधाम में लौट जाना चाहिए वही आपका परमधाम है।