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कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।।
अर्थ हे योगी ! सदा चिंतन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूं, हे भगवान आप किन किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन किए जा सकते हैं ? हे जनार्दन, आत्मयोग को और विभूति योग को आप विस्तार से फिर कहिए आपके अमृत वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही। व्याख्यागीता अध्याय 10 का श्लोक 17-18 - Geeta 10.17-18  अर्जुन पूछ रहे हैं कि हे योगेश्वर मैं आपको हर पल नित्य निरन्तर चिन्तन, ध्यान, समाधि करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ कैसे विचारों से आप चिन्तन किए जा सकते हैं, मैं कैसे आपको चिन्तन करूँ। हे जनार्धन आप अपने योग और विभूति को दोबारा विस्तार से कहिए। जब किसी को सम्पूर्ण सत्य ज्ञान के बारे में ज्ञान होने लगता है, तब वह साधक मीरा बन जाता है, भगवान का जब आत्मज्ञान होता है, शुरूआत में तब जन्मों-जन्मों की दौड़ मनुष्य की शांत होती है। तब आनंद में बह जाने को मन चाहता है। अर्जुन ने जन्मों जन्मों से परमात्मा को पाने की चाह रखी थी। तब वह ज्ञान अर्जुन को मिला तो अर्जुन तृप्त नहीं हो पाया है और ज्ञान को बार-बार सुनूं, यह चाहने लगा, क्योंकि चिरकाल से भटक रहे जीव को जब परम के प्रकाश का ज्ञान होने लगता है, तब वह और भी इच्छुक हो जाता है, अर्जुन भी यही कह रहा है कि आपके अमृतमय वचन को सुनकर तृप्ति नहीं हो रही है अपनी विभूतियों को थोड़ा और विस्तार यानि बात को खोल कर कहिए। अर्जुन का मन चाहे कितना ही उलझा हुआ क्यँू ना हो फिर भी वो अपने को धोखे में नहीं रखना चाहता, अपने भीतर के सारे विचारों को जान लेना चाहता है, अर्जुन को कोई-कोई बात समझ नहीं आती तो वह उस बात को दोबारा पूछ लेता है, उसको पता है कि भीतर कुछ सवाल उठ रहे हैं कुछ तृप्ति नहीं मिल रही है, तब अर्जुन बेझिझक होकर अपने द्वंद्व का उत्तर चाहते हैं, अर्जुन भीतर से सरल व्यक्तित्व का ईमानदार है अपने खुद के प्रति, शायद यही उसकी योग्यता है कि कृष्ण का ज्ञान उसे प्राप्त हो सका। दो तरह के ईमानदार होते हैं, एक ईमानदारी है जो हम दूसरों के प्रति रखते हैं, वह ईमानदारी बहुत छोटी ईमानदारी है काम चलाऊ है, एक और ईमानदारी है वह गहरी है, जो व्यक्ति अपने प्रति रखता है, वह ईमानदारी खोजनी बड़ी मुश्किल है। पहली ईमानदारी खोजनी बहुत मुश्किल फिर दूसरी तो उससे भी ज्यादा खोजनी मुश्किल है। धार्मिक जीवन की वही व्यक्ति शुरूआत कर पाएगा जो अपने प्रति ईमानदार है, जो व्यक्ति अपने खुद को जानने का साहस कर पाता है, वह अपने भीतर झाँक कर देख ले कि कितनी खुद में बीमारियाँ, काम, क्रोध, इच्छाएँ है और उनको पूरा करने के लिए वह अपने प्रति कितना झूठा है, चाहे कितनी भी अपने भीतर कमियाँ हो जो शांत भाव से देखने को तैयार हैं और स्वीकार करने को तैयार हैं कि मैं ऐसा इंसान हूँ, वही व्यक्ति धार्मिक हो सकता है, अपने खुद के प्रति ईमानदार मनुष्य ही भक्ति मार्ग पर चल सकता है, अपने प्रति ईमानदारी धर्मिक व्यक्ति का पहला कदम है, कितना भी अँधेरा हो जाए व्यक्ति को दूसरे का पता नहीं चलेगा लेकिन कितना भी गहन अंधेरा हो जाए व्यक्ति अपने आप को तो जानता ही रहेगा, ऐसा तो नहीं कि अँधेरा होते ही आप कहो कि मुझको तो पता नहीं कि मेरे हाथ पैर है कि नहीं, मैं हूँ कि नहीं, आदमी को खुद का पता तो चलता ही रहेगा, आदमी अपने भीतर जैसा है उसको जान ले और स्वीकार करके उनको ठीक करने की सोचे वही व्यक्ति अपने खुद के प्रति ईमानदार माना जाता है। अर्जुन कहता है सम्पूर्ण प्राणियों के ईश्वर, देवों के देव, जगत के स्वामी आप खुद ही अपने आप को जानते हैं, इसी को मैं उसकी ईमानदारी कह रहा हूँ। आप अपने मानने को ही जानना कहने लग जाते हैं, तब आपकी बेईमानी हो जाती है, अगर आप भी कहें मैं परमात्मा को मानता हूँ, जानता नहीं, तो आप धार्मिक और ईमानदार व्यक्ति हैं। अर्जुन कहते हैं हे योगी सदा चिंतन करता हुआ मैं कैसे आपको जानूँ, अर्जुन ने समर्पण किया है कृष्ण को और जब समर्पण हो जाता है वही शरणागत है। तब दो शरीर एक नहीं हो सकते लेकिन दो शरीरों कि आत्मा एक हो जाती है, जितनी सीमा तरल होगी उतनी एकता आसान होगी, अगर हम दो पत्थरों को पास रख दें, वह एक नहीं होते उनकी सीमा मजबूत है, अगर हम पानी की दो बूँदों को पास रख दें, वे एक हो जाएँगी क्योंकि उनकी सीमा तरल है। कमरे में दो दीये जला दें प्रकाश एक हो जाएगा क्योंकि उनमें टकरावट नहीं, एक कमरे में बीस लोग ध्यान लगाए सबके शरीर अलग-अलग रह जाएँगे लेकिन सबकी आत्मा एक हो जाएगी, अर्जुन कहता है सम्पूर्ण ज्ञान आपने कहा मैं सत्य मानता हूँ, जहाँ समर्पण होगा, वहाँ टकरावट नहीं होती सीमा तरल हो जाती है, जब आत्मा एक हो जाए तब शब्दों की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर शब्दों की जरूरत पड़े तो भी बिलकुल इशारा मात्र ही काफी होता है। अर्जुन कहते हैं आपके आत्मयोग और विभूति को पुनः कहिए आपके अमृत वचन सुनते-सुनते तृप्ति नहीं हो रही, अगर गुरू के सत्य वचन आपको अमृत लगने लग जाए तो आप यह मानना की आपने समर्पण कर दिया है और आप अपने खुद के प्रति ईमानदार भी हैं।
  • अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार करके भगवान अब आगे के श्लोकों में अपनी विभूतियों और योग को कहना आरम्भ करते हैं।